《纽约时报》报道,中国交通银行广州分行前党委书记、行长刘昌明的妻子及两名子女被限制出境中国,三人都拥有美国国籍,其中一人在美国出生。刘昌明是逃亡海外的“天网”百名嫌疑犯之一,被控违规放贷近100亿元人民币,自2015年起被国际刑警组织以红色通缉令追捕。所谓“红通”就是国际刑警组织发布的“红色通告”的简称。
刘姓姐弟认为,中国政府希望以限制他们出境中国而向他们的父亲施压。
红通嫌犯刘昌明
今年六月,刘昌明的女儿Cynthia Liu及儿子Victor Liu,陪同他们的美籍华裔母亲Sandra Han到中国探望一名生病的亲属。Cynthia是麦肯锡咨询公司纽约办公室的员工;而Victor是华盛顿乔治城大学的大二学生。
Sandra Han和Cynthia Liu是在中国出生的华裔美国人,而Victor Liu出生于美国,他们都使用了美国护照入境中国。
三人抵达中国后不久,Sandra Han就被逮捕,并带到一个秘密的拘留地点。
刘姓姐弟前后三次尝试离境中国但都未获成功,同时中国警察告诉这对姐弟,他们没有因犯罪而被调查,也不会被起诉。
据称,刘昌明在2007年离开中国,从2012年起就与妻子及两名子女切断了联系。在2015年,他的名字出现在中国“天网”行动全球通缉外逃人员的百人名单。
Cynthia Liu在今年八月写信给美国国家安全顾问博尔顿 (John Bolton),指她的家人被当做人质,来诱捕一个他们已不再保有联系的人。
根据《纽约时报》的报道,刘姓姐弟都曾是一家收费不菲的寄宿学校的学生,他们的母亲Sandra Han则在美国拥有价值超过千万美元的房产,但并不清楚购买这些房产的资金是否来自刘昌明涉嫌挪用的资金。
Tuesday, November 27, 2018
Monday, November 26, 2018
पहली और दूसरी के बच्चों को होमवर्क न दें, बस्ते का वजन 1.5 किलो से ज्यादा न हो
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने स्कूलों को निर्देश दिए हैं कि पहली और दूसरी के छात्रों को होमवर्क ना दिया जाए। उनके बस्ते का वजन भी डेढ़ किलोग्राम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। मंत्रालय ने पहली से दसवीं क्लास तक के बच्चों के बस्तों का वजन भी तय कर दिया है। देशभर के स्कूलों को ये निर्देश जारी किए गए हैं।
पहली-दूसरी के बच्चों को केवल गणित और भाषाएं पढ़ाई जाएं
मंत्रालय के मुताबिक, विषयों की पढ़ाई और बस्तों के वजन को केंद्र सरकार के निर्देशों के हिसाब से ही नियंत्रित किया जाए। शिक्षण संस्थान पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को होमवर्क नहीं दे सकते।
निर्देशों में कहा गया- पहली और दूसरी क्लास के बच्चों के लिए भाषा और गणित के अलावा कोई दूसरा विषय तय नहीं किया जाना चाहिए। तीसरी से पांचवीं तक एनसीईआरटी द्वारा तय भाषा, गणित और पर्यावरण विज्ञान के अलावा दूसरे विषय नहीं पढ़ाने चाहिए।
मंत्रालय ने स्कूलों से कहा कि छात्रों को अतिरिक्त किताबें और सामान लाने को नहीं कहा जा सकता। बस्ते का वजन भी तय सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।
पहली और दूसरी क्लास के बच्चों के बस्तों का वजन 1.5 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। तीसरी से पांचवीं तक बस्तों के वजन की सीमा 2 से 3 किलो तय की गई है।
छठी और सातवीं क्लास तक बस्ते का वजन 4 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। आठवीं और नौवीं तक ये सीमा 4.5 किलो है। 10वीं के छात्रों का बस्ता 5 किलो से ज्यादा भारी नहीं होना चाहिए।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की उपस्थित का सही डाटा जुटाने के लिए राज्य सरकार बड़ा कदम उठाने जा रही है। इसके तहत सरकारी स्कूल के शिक्षकों की ही तरह अब सभी बच्चों का भी बायोमैट्रिक हाजिरी बनेगी, और वे अंगूठा लगाकर अपनी उपस्थिति स्कूल में दर्ज कराएंगे। इसे नए साल से अनिवार्य रूप से लागू कर दिया जाएगा। स्कूली बच्चों का बायोमैट्रिक हाजिरी ई विद्यावाहिनी योजना के तहत स्कूलों को दिए गए टैबलेट के माध्य से ही बनेगा। ऐसे में सभी जिलों को इसकी तैयारी भी से शुरू करने को कहा गया है।
स्कूलों के प्रधानाध्यापकों और क्लर्कों को दिया जाएगा प्रशिक्षण
विभाग का मानना है कि बच्चों की संख्या बहुत अधिक है ऐसे में इसके लिए बड़े स्तर पर तैयारी भी करनी होगी। अत: सभी स्कूलों के प्रधानाध्यापकों व क्लर्कों को इसका प्रशिक्षण अभी से देने को कहा गया है ताकि बाद में इसे लेकर कोई परेशानी न हो। मालूम हो कि अभी तक बच्चों की उपस्थित रजिस्टर में मनमाने ढंग से बनती हैं। इस योजना के लागू हो के साथ ही राज्य के करीब 40 से अधिक बच्चों के उपस्थिति का सही डाटा सरकार के पास उपलब्ध हो सकेगा।
विद्यार्थियों की उपस्थिति को लेकर गलत आंकड़े दर्ज करने की है शिकायत
मिली जानकारी के अनुसार छात्रों के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी को अनिवार्य करने का मुख्य उद्देश्य स्कूल में छात्रों का नामक के मुकाबले उनकी नियमिति उपस्थिति का सही आंकड़े को जानना है। सरकार को शक है कि कई स्कूल एमडीएम में अधिक राशि लेने के लिए बच्चों की उपस्थिति को अधिक दर्ज कर देते हैं। जबकि वे बच्चे स्कूल में होते ही नहीं है। इसकी प्रकार कई बाद छात्रों की अधिक उपस्थिति स्कूल में दिखलाने के लिए भी रजिस्टर में गलत ढंग से उपस्थित को दर्ज करते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि स्कूल न आने वाले बच्चों का सही डाटा सरकार को नहीं मिल पाता है। लेकिन बायोमैट्रिक हाजिरी बनने से बच्चों की उपस्थिति का सही आंकड़ा हर दिन का मिल जाएगा।
1 से 12वीं तक के बच्चों की बनेगी हाजिरी
सरकारी स्कूलों के बच्चों की बायोमैट्रिक हाजिरी की बात करें तो अकेले पूर्वी सिंहभूम जिले के करीब 1.50 लाख से अधिक बच्चों को इस योजना में शामिल किया जाएगा। इसके तहत एक सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 1 से 12वीं तक के बच्चों की हाजिरी बायोमैट्रिक सिस्टम के तहत बनेगी।
इनका है कहना
डीईओ शिवेंद्र कुमार का कहना है कि नए साल से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चों की हाजिरी बायोमैट्रिक सिस्टम के तहत बनेगी। ई विद्यावाहिनी योजना के तहत जो टेबलेट स्कूलों को दिया गया है उसी में बच्चे अंगूठा लगाकर अपनी हाजिरी नियमित बनाएंगे। इस योजना को लागू करने के लिए तैयारी शुरू कर दी गई है। अगले चरण में स्कूलों के प्रधानाध्यापकों के साथ क्लर्कों को प्रशिक्षित किया जाएगा।
पहली-दूसरी के बच्चों को केवल गणित और भाषाएं पढ़ाई जाएं
मंत्रालय के मुताबिक, विषयों की पढ़ाई और बस्तों के वजन को केंद्र सरकार के निर्देशों के हिसाब से ही नियंत्रित किया जाए। शिक्षण संस्थान पहली और दूसरी क्लास के बच्चों को होमवर्क नहीं दे सकते।
निर्देशों में कहा गया- पहली और दूसरी क्लास के बच्चों के लिए भाषा और गणित के अलावा कोई दूसरा विषय तय नहीं किया जाना चाहिए। तीसरी से पांचवीं तक एनसीईआरटी द्वारा तय भाषा, गणित और पर्यावरण विज्ञान के अलावा दूसरे विषय नहीं पढ़ाने चाहिए।
मंत्रालय ने स्कूलों से कहा कि छात्रों को अतिरिक्त किताबें और सामान लाने को नहीं कहा जा सकता। बस्ते का वजन भी तय सीमा से अधिक नहीं होना चाहिए।
पहली और दूसरी क्लास के बच्चों के बस्तों का वजन 1.5 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। तीसरी से पांचवीं तक बस्तों के वजन की सीमा 2 से 3 किलो तय की गई है।
छठी और सातवीं क्लास तक बस्ते का वजन 4 किलो से ज्यादा नहीं होना चाहिए। आठवीं और नौवीं तक ये सीमा 4.5 किलो है। 10वीं के छात्रों का बस्ता 5 किलो से ज्यादा भारी नहीं होना चाहिए।
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की उपस्थित का सही डाटा जुटाने के लिए राज्य सरकार बड़ा कदम उठाने जा रही है। इसके तहत सरकारी स्कूल के शिक्षकों की ही तरह अब सभी बच्चों का भी बायोमैट्रिक हाजिरी बनेगी, और वे अंगूठा लगाकर अपनी उपस्थिति स्कूल में दर्ज कराएंगे। इसे नए साल से अनिवार्य रूप से लागू कर दिया जाएगा। स्कूली बच्चों का बायोमैट्रिक हाजिरी ई विद्यावाहिनी योजना के तहत स्कूलों को दिए गए टैबलेट के माध्य से ही बनेगा। ऐसे में सभी जिलों को इसकी तैयारी भी से शुरू करने को कहा गया है।
स्कूलों के प्रधानाध्यापकों और क्लर्कों को दिया जाएगा प्रशिक्षण
विभाग का मानना है कि बच्चों की संख्या बहुत अधिक है ऐसे में इसके लिए बड़े स्तर पर तैयारी भी करनी होगी। अत: सभी स्कूलों के प्रधानाध्यापकों व क्लर्कों को इसका प्रशिक्षण अभी से देने को कहा गया है ताकि बाद में इसे लेकर कोई परेशानी न हो। मालूम हो कि अभी तक बच्चों की उपस्थित रजिस्टर में मनमाने ढंग से बनती हैं। इस योजना के लागू हो के साथ ही राज्य के करीब 40 से अधिक बच्चों के उपस्थिति का सही डाटा सरकार के पास उपलब्ध हो सकेगा।
विद्यार्थियों की उपस्थिति को लेकर गलत आंकड़े दर्ज करने की है शिकायत
मिली जानकारी के अनुसार छात्रों के लिए बायोमैट्रिक हाजिरी को अनिवार्य करने का मुख्य उद्देश्य स्कूल में छात्रों का नामक के मुकाबले उनकी नियमिति उपस्थिति का सही आंकड़े को जानना है। सरकार को शक है कि कई स्कूल एमडीएम में अधिक राशि लेने के लिए बच्चों की उपस्थिति को अधिक दर्ज कर देते हैं। जबकि वे बच्चे स्कूल में होते ही नहीं है। इसकी प्रकार कई बाद छात्रों की अधिक उपस्थिति स्कूल में दिखलाने के लिए भी रजिस्टर में गलत ढंग से उपस्थित को दर्ज करते हैं। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि स्कूल न आने वाले बच्चों का सही डाटा सरकार को नहीं मिल पाता है। लेकिन बायोमैट्रिक हाजिरी बनने से बच्चों की उपस्थिति का सही आंकड़ा हर दिन का मिल जाएगा।
1 से 12वीं तक के बच्चों की बनेगी हाजिरी
सरकारी स्कूलों के बच्चों की बायोमैट्रिक हाजिरी की बात करें तो अकेले पूर्वी सिंहभूम जिले के करीब 1.50 लाख से अधिक बच्चों को इस योजना में शामिल किया जाएगा। इसके तहत एक सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 1 से 12वीं तक के बच्चों की हाजिरी बायोमैट्रिक सिस्टम के तहत बनेगी।
इनका है कहना
डीईओ शिवेंद्र कुमार का कहना है कि नए साल से सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चों की हाजिरी बायोमैट्रिक सिस्टम के तहत बनेगी। ई विद्यावाहिनी योजना के तहत जो टेबलेट स्कूलों को दिया गया है उसी में बच्चे अंगूठा लगाकर अपनी हाजिरी नियमित बनाएंगे। इस योजना को लागू करने के लिए तैयारी शुरू कर दी गई है। अगले चरण में स्कूलों के प्रधानाध्यापकों के साथ क्लर्कों को प्रशिक्षित किया जाएगा।
Monday, November 12, 2018
क्या अमित शाह का उपनाम वाक़ई फ़ारसी है?
उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने हाल ही में इलाहाबाद और फ़ैज़ाबाद का नाम आधिकारिक तौर पर बदलकर क्रमश: प्रयागराज और अयोध्या कर दिया है.
भाजपा नेता अयोध्या और प्रयागराज जैसे हिंदी नामों को हिंदू संस्कृति का प्रतीक बताते रहे हैं, जबकि फ़ारसी से उपजे नामों को मुग़लकाल में थोपे गए विदेशी प्रतीक के तौर पर देखते रहे हैं.
जब इलाहाबाद का नाम बदलने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि क्यों आपका नाम रावण या दुर्योधन नहीं रखा गया?
इसी सिलसिले में हाल ही में इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने कहा था कि अगर भाजपा को फ़ारसी नामों से आपत्ति है तो उन्हें सबसे पहले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का नाम बदलने पर विचार करना चाहिए क्योंकि 'शाह' शब्द भी फ़ारसी से आया है.
पत्रकार और लेखक अजित वडनेरकर इस लेख में अतीत के पन्नों में इसी 'शाह' शब्द की तलाश कर रहे हैं: -
यही नहीं, पच-पचाकर जो धारा सामने आती है उसमें से यह जानने की इच्छा कि देखें, कौन सिन्ध की धार से आया और कौन काबुल दरिया से. किसमें आमु दरिया का असर है और किसमें सीर का पानी है. "पानी से पानी मिलै, एक रंग ह्वै जाए", हिन्दुस्तान होने के यही मानी हैं और हिन्दू होने के भी, समझदानी कैसी है, उस पर निर्भर करता है.
'शाह' उपनाम भी ऐसा ही एक विषय है. ईरानी मूल का शब्द जिसका प्रयोग सत्ता-प्रमुख के तौर पर होता रहा. सूफ़ियों ने जो आध्यात्मिक सत्ता क़ायम की तो उसके पीरों को भी इसी अर्थ में 'शाह' कहा जाने लगा. बाद में जिस तरह से 'राजा' उपाधि बंटने लगी, उसी तरह 'शाह' का चलन भी हुआ.
ये सभी उपाधियाँ उपनाम की तरह अपना ली गईं. शाह को लेकर दो तरह की धारणाएं हैं. संस्कृत में शास् क्रिया है जिसमें नियंत्रण, प्रबन्धन, नियमन, शासन, दमन, विधान, हुकूमत जैसे आशय हैं. स के ह में बदलाव के चलते शास् का ही रूप शाह् हुआ.
आमतौर पर हिन्दी का शाह उपनाम फ़ारसी शाह से जोड़ा जाता है. यह गलत नहीं, पर प्रत्येक शाह, फ़ारसी वाला शाह भी नहीं. वणिकों में साह उपनाम होता है (जिनमें तेली, पंसारी शामिल हैं) जो 'साधु' से बना है. इन्हें साहू भी कहते हैं.
शिवाजी के पौत्र का पुकारनाम शाहू था. दरअसल यह 'साधु' का ही मराठी रूपान्तर है न कि फ़ारसी शाह से रूपान्तरित. मराठी में ऊकारीकरण की प्रवृत्ति नहीं है. यूँ भी फ़ारसी शाह का मराठी रूप 'शहा' होगा.
राहुल सांकृत्यायन, चतुरसेन शास्त्री जैसे अनेक लेखकों ने शहंशाह की तर्ज़ पर शासानुशास का प्रयोग भी किया है. शास् और अनुशास का मेल. दोनों का अर्थ एक ही है. संस्कृत परम्परा में शासानुशास जैसा पद नहीं मिलता.
ज़ाहिर है, तब इस आधार पर स-ह के रूपान्तर से शाहानुशाही, तदनुरूप शाहंशाह जैसे रूपान्तर के पीछे ठोस आधार नहीं है.
इतिहास की किताबों में हम सबने क्षत्रप और महाक्षत्रप जैसे पदनाम पढ़े हैं. ये ईरानी मूल के शब्द हैं जो संस्कृत कोशों में भी दर्ज़ हैं. दरअसल ये हखामनी साम्राज्य की उपाधियाँ थीं जिन्हें शक अपने साथ-साथ लगाने के शौकीन थे. उस समय तक्षशिला, मथुरा, उज्जयिनी और नासिक शकों की प्रमुख राजधानियां थीं.
भाजपा नेता अयोध्या और प्रयागराज जैसे हिंदी नामों को हिंदू संस्कृति का प्रतीक बताते रहे हैं, जबकि फ़ारसी से उपजे नामों को मुग़लकाल में थोपे गए विदेशी प्रतीक के तौर पर देखते रहे हैं.
जब इलाहाबाद का नाम बदलने पर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि क्यों आपका नाम रावण या दुर्योधन नहीं रखा गया?
इसी सिलसिले में हाल ही में इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने कहा था कि अगर भाजपा को फ़ारसी नामों से आपत्ति है तो उन्हें सबसे पहले पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का नाम बदलने पर विचार करना चाहिए क्योंकि 'शाह' शब्द भी फ़ारसी से आया है.
पत्रकार और लेखक अजित वडनेरकर इस लेख में अतीत के पन्नों में इसी 'शाह' शब्द की तलाश कर रहे हैं: -
यही नहीं, पच-पचाकर जो धारा सामने आती है उसमें से यह जानने की इच्छा कि देखें, कौन सिन्ध की धार से आया और कौन काबुल दरिया से. किसमें आमु दरिया का असर है और किसमें सीर का पानी है. "पानी से पानी मिलै, एक रंग ह्वै जाए", हिन्दुस्तान होने के यही मानी हैं और हिन्दू होने के भी, समझदानी कैसी है, उस पर निर्भर करता है.
'शाह' उपनाम भी ऐसा ही एक विषय है. ईरानी मूल का शब्द जिसका प्रयोग सत्ता-प्रमुख के तौर पर होता रहा. सूफ़ियों ने जो आध्यात्मिक सत्ता क़ायम की तो उसके पीरों को भी इसी अर्थ में 'शाह' कहा जाने लगा. बाद में जिस तरह से 'राजा' उपाधि बंटने लगी, उसी तरह 'शाह' का चलन भी हुआ.
ये सभी उपाधियाँ उपनाम की तरह अपना ली गईं. शाह को लेकर दो तरह की धारणाएं हैं. संस्कृत में शास् क्रिया है जिसमें नियंत्रण, प्रबन्धन, नियमन, शासन, दमन, विधान, हुकूमत जैसे आशय हैं. स के ह में बदलाव के चलते शास् का ही रूप शाह् हुआ.
आमतौर पर हिन्दी का शाह उपनाम फ़ारसी शाह से जोड़ा जाता है. यह गलत नहीं, पर प्रत्येक शाह, फ़ारसी वाला शाह भी नहीं. वणिकों में साह उपनाम होता है (जिनमें तेली, पंसारी शामिल हैं) जो 'साधु' से बना है. इन्हें साहू भी कहते हैं.
शिवाजी के पौत्र का पुकारनाम शाहू था. दरअसल यह 'साधु' का ही मराठी रूपान्तर है न कि फ़ारसी शाह से रूपान्तरित. मराठी में ऊकारीकरण की प्रवृत्ति नहीं है. यूँ भी फ़ारसी शाह का मराठी रूप 'शहा' होगा.
राहुल सांकृत्यायन, चतुरसेन शास्त्री जैसे अनेक लेखकों ने शहंशाह की तर्ज़ पर शासानुशास का प्रयोग भी किया है. शास् और अनुशास का मेल. दोनों का अर्थ एक ही है. संस्कृत परम्परा में शासानुशास जैसा पद नहीं मिलता.
ज़ाहिर है, तब इस आधार पर स-ह के रूपान्तर से शाहानुशाही, तदनुरूप शाहंशाह जैसे रूपान्तर के पीछे ठोस आधार नहीं है.
इतिहास की किताबों में हम सबने क्षत्रप और महाक्षत्रप जैसे पदनाम पढ़े हैं. ये ईरानी मूल के शब्द हैं जो संस्कृत कोशों में भी दर्ज़ हैं. दरअसल ये हखामनी साम्राज्य की उपाधियाँ थीं जिन्हें शक अपने साथ-साथ लगाने के शौकीन थे. उस समय तक्षशिला, मथुरा, उज्जयिनी और नासिक शकों की प्रमुख राजधानियां थीं.
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